भारत में पर्यावरण आंदोलन: इतिहास, प्रतिमान और पर्यावरणीय न्याय का राजनीतिक अर्थशास्त्र
Author(s): Tinku Kumar and Bharti Sehta
Abstract: बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में औद्योगिकीकरण, कृषि–व्यावसायीकरण, नगरीकरण, विकास–परियोजनाओं तथा वैश्विक बाज़ारवाद के दबाव ने भारत में अभूतपूर्व पर्यावरणीय संकट उत्पन्न किया। वनों की कटाई, खनन विस्तार, भूमि अधिग्रहण, जल प्रदूषण एवं जलवायु परिवर्तन ने ग्रामीण, आदिवासी तथा पारिस्थितिकी–निर्भर समुदायों को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। इस परिस्थिति ने भारत में अनेक पर्यावरण आंदोलनों को जन्म दिया, जिनका उद्देश्य केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं बल्कि सामाजिक न्याय, आदिवासी अधिकार, आजीविका सुरक्षा तथा लोकतांत्रिक भागीदारी की रक्षा भी रहा। चिपको आंदोलन, नर्मदा बचाओ आंदोलन, साइलेंट वैली आंदोलन, न्यामगिरी पहाड़ आंदोलन तथा हसदेव अरण्य आंदोलन ने राज्य–केन्द्रित विकास मॉडल को चुनौती देते हुए पर्यावरणीय न्याय, सतत विकास तथा समुदाय–आधारित संसाधन प्रबंधन की वैकल्पिक अवधारणा को स्थापित किया। इस शोध–पत्र में भारत के पर्यावरण आंदोलनों के ऐतिहासिक विकास, प्रमुख प्रवृत्तियों, नेतृत्व–रणनीति, सामाजिक–आर्थिक प्रभाव एवं नीतिगत परिणामों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
DOI: 10.33545/26646021.2026.v8.i1a.832Pages: 49-54 | Views: 109 | Downloads: 8Download Full Article: Click Here
How to cite this article:
Tinku Kumar, Bharti Sehta.
भारत में पर्यावरण आंदोलन: इतिहास, प्रतिमान और पर्यावरणीय न्याय का राजनीतिक अर्थशास्त्र. Int J Political Sci Governance 2026;8(1):49-54. DOI:
10.33545/26646021.2026.v8.i1a.832