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International Journal of Political Science and Governance
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P-ISSN: 2664-6021, E-ISSN: 2664-603X, Impact Factor (RJIF): 5.92
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2025, Vol. 7, Issue 9, Part B

आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता: प्रतिद्वन्द्विता या परस्पर पूरकता


Author(s): राजेश कुमार दूबे, डाॅ. रजनी कांत पाण्डेय

Abstract:
आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता सामाजिक विज्ञान एवं दर्शन के क्षेत्र में दो ऐसी प्रमुख बौद्धिक धाराएँ हैं, जिन्होंने बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी के वैचारिक विमर्श को गहराई से प्रभावित किया है। आधुनिकता, जहाँ तर्कसंगतता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रगति, व्यक्तिवाद और सार्वभौमिक मूल्यों की स्थापना पर बल देती है, वहीं उत्तर आधुनिकता इन ‘महाकथाओं’ और सार्वभौमिक दावों को चुनौती देती हुई बहुलता, सापेक्षता, शक्ति-विमर्श तथा सांस्कृतिक विखंडन की ओर ध्यान आकर्षित करती है। इस प्रकार आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता के बीच एक निरंतर द्वंद्व दिखाई देता है, जिसमें पहला व्यवस्था और स्थिरता पर बल देता है जबकि दूसरा प्रश्नाकुलता और विविधता का समर्थन करता है। हालाँकि, गहन विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता को केवल परस्पर प्रतिद्वन्द्वी दृष्टिकोणों के रूप में नहीं देखा जा सकता। आधुनिकता की जो सीमाएँ जैसे कठोर तर्कवाद, यथार्थ का एकांगी
दृष्टिकोण तथा परम्पराओं के प्रति असंवेदनशीलताकृप्रकट होती हैं, उन्हें उत्तर आधुनिकता उजागर करती है और वैकल्पिक दृष्टि प्रदान करती है। इसी प्रकार उत्तर आधुनिकता की अराजकता, अत्यधिक सापेक्षवाद और स्थायी मूल्यों के अभाव जैसी चुनौतियों को संतुलित करने का कार्य आधुनिकता की स्थिरता और वैज्ञानिक दृष्टि करती है। अतः दोनों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में समझा जा सकता है, जो सामाजिक-राजनीतिक विमर्श को अधिक समृद्ध, बहुआयामी और आलोचनात्मक बनाते हैं। इस लेख में आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता की अवधारणाओं, उनके मूलभूत अंतर-विरोधों तथा संभावित पूरकता का सम्यक् विश्लेषण किया गया है। उद्देश्य यह है कि यह विमर्श केवल टकराव का प्रतीक नहीं है, बल्कि सामाजिक यथार्थ को समझने का एक संयुक्त बौद्धिक प्रयास भी है।



DOI: 10.33545/26646021.2025.v7.i9b.672

Pages: 125-128 | Views: 398 | Downloads: 15

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How to cite this article:
राजेश कुमार दूबे, डाॅ. रजनी कांत पाण्डेय. आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता: प्रतिद्वन्द्विता या परस्पर पूरकता. Int J Political Sci Governance 2025;7(9):125-128. DOI: 10.33545/26646021.2025.v7.i9b.672
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