21वीं सदी में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की न्यायिक सक्रियता का तुलनात्मक प्रवृत्ति अध्ययन
Author(s): प्रियसी
Abstract: 21वीं सदी में भारतीय न्यायपालिका की भूमिका उल्लेखनीय रूप से परिवर्तित हुई है। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने न केवल संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय हस्तक्षेप किया है, बल्कि शासन–सुधार, पर्यावरणीय संरक्षण, सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता तथा प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे क्षेत्रों में नीतिगत निर्देश देकर अपने अधिकार–क्षेत्र का विस्तार भी किया है। न्यायिक सक्रियता को अक्सर दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों से समझा जाता है, एक ओर यह नागरिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का उपकरण माना जाता है, जबकि दूसरी ओर इसे न्यायिक अतिक्रमण के रूप में आलोचना का सामना भी करना पड़ता है। यह शोध–लेख 2000–2025 के बीच सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की सक्रियता की तुलनात्मक प्रवृत्तियों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन में लोकहित याचिकाओं के आँकड़े, न्यायालयीय हस्तक्षेप के प्रमुख क्षेत्रों, संवैधानिक व्याख्या के दायरे, केस–लॉ उदाहरणों और न्यायिक संसाधनों (जैसे लंबित वाद व न्यायाधीश–जनसंख्या अनुपात) का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। निष्कर्षतः यह स्पष्ट होता है कि जहाँ सर्वोच्च न्यायालय व्यापक संवैधानिक–राजनीतिक प्रश्नों पर सक्रिय रहा, वहीं उच्च न्यायालयों ने स्थानीय शासन, प्रशासनिक जवाबदेही और राज्य–स्तरीय नीति–विवादों में अधिक हस्तक्षेप किया। इस प्रकार न्यायिक सक्रियता की प्रवृत्ति बहुस्तरीय और बहुआयामी है, जो भारत के संघीय ढाँचे के सापेक्ष विभिन्न स्तरों पर भिन्न–भिन्न रूपों में प्रकट होती है।
प्रियसी. 21वीं सदी में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की न्यायिक सक्रियता का तुलनात्मक प्रवृत्ति अध्ययन. Int J Political Sci Governance 2025;7(6):70-73. DOI: 10.33545/26646021.2025.v7.i6a.807