संविधान सभा में महिलाओं की भूमिका और राजनीतिक अधिकारों की बहस: एक विश्लेषण
Author(s): सुधांशु शेखर
Abstract: भारत की संविधान सभा (1946–1950) में महिलाओं की भागीदारी ने न केवल राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया को समावेशी बनाया, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और लैंगिक समानता के मूल्यों को भी गहरी वैधता प्रदान की। सभा में मौजूद 15 महिला सदस्यों—जैसे हंसा मेहता, दुर्गाबाई देशमुख, राजकुमारी अमृत कौर, सरोजिनी नायडू और सुचेता कृपलानी—ने शिक्षा, समान अधिकार, नागरिक स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर अत्यंत महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किए। महिलाओं ने विशेष रूप से मूल अधिकारों में लैंगिक समानता, समान नागरिक संहिता की आवश्यकता, विवाह-उत्तर संपत्ति अधिकार, श्रम सुरक्षा, तथा राजनीतिक भागीदारी जैसे मुद्दों पर प्रभावशाली तर्क प्रस्तुत किए। हंसा मेहता और अमृत कौर ने स्पष्ट रूप से कहा कि लोकतंत्र तभी सार्थक होगा जब महिलाएं पूर्ण नागरिक अधिकारों के साथ राजनीतिक और सामाजिक जीवन में भाग लें। बहसों में महिलाओं ने विशेषाधिकार नहीं, बल्कि “समान अवसर” और “कानूनी बराबरी” की मांग रखी। वे आरक्षण की बजाय शिक्षा, आर्थिक अवसरों और संवैधानिक संरक्षा को अधिक महत्वपूर्ण मानती थीं। उनके विचारों के परिणामस्वरूप संविधान में समानता का अधिकार, विधि के समक्ष समान संरक्षण, भेदभाव-निरोध, तथा महिलाओं और बच्चों की विशेष सुरक्षा से जुड़े प्रावधान शामिल किए गए। राजनीतिक अधिकारों, विशेषकर सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की स्वीकृति, महिलाओं के योगदान का एक मील का पत्थर साबित हुई। इस प्रकार, संविधान सभा में महिलाओं की भूमिका केवल प्रतीकात्मक नहीं थी; उन्होंने संवैधानिक ढांचे को प्रगतिशील, समतावादी और न्यायपूर्ण बनाने में निर्णायक योगदान दिया।
DOI: 10.33545/26646021.2025.v7.i11c.790Pages: 222-225 | Views: 159 | Downloads: 1Download Full Article: Click Here
How to cite this article:
सुधांशु शेखर.
संविधान सभा में महिलाओं की भूमिका और राजनीतिक अधिकारों की बहस: एक विश्लेषण. Int J Political Sci Governance 2025;7(11):222-225. DOI:
10.33545/26646021.2025.v7.i11c.790