शक्तियों के पृथक्करण की अवधारणा पर न्यायिक सक्रियता का प्रभाव तथा एक राजनीतिक विश्लेषण
Author(s): प्रियसी
Abstract: भारतीय संविधान ने ब्रिटिश संसदीय परंपरा और महाद्वीपीय संवैधानिक विचार के बीच संतुलन बनाते हुए शक्तियों के पृथक्करण की कठोर न होकर कार्यात्मक रूप से पृथक–समन्वित व्यवस्था अपनायी है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को अलग–अलग कार्य–क्षेत्र प्रदान करते हुए भी संविधान ने परस्पर नियंत्रण और संतुलन के माध्यम से एक ‘संवैधानिक संवाद’ की गुंजाइश छोड़ी है। स्वतंत्रता के बाद विशेषकर आपातकाल–उपरांत दौर में सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों द्वारा अपनायी गयी न्यायिक सक्रियता ने इस संवाद को नये आयाम दिए हैं। लोकहित याचिका, मूल अधिकारों के विस्तारवादी व्याख्यायन, बुनियादी संरचना सिद्धांत और न्यायिक समीक्षा के सुदृढीकरण ने जहाँ नागरिक अधिकारों, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की रक्षा की, वहीं अनेक न्यायिक निर्णयों ने नीतिनिर्धारण, संसाधन–वितरण तथा नियुक्ति प्रक्रिया में न्यायपालिका की बढ़ती भूमिका को लेकर शक्तियों के पृथक्करण पर गहन बहस खड़ी की है। यह शोध–लेख भारतीय संदर्भ में शक्तियों के पृथक्करण की संवैधानिक एवं वैचारिक रूप–रेखा का अवलोकन करता है, न्यायिक सक्रियता के प्रमुख चरणों और रूपों का विश्लेषण करता है, और प्रमुख निर्णयों (जैसे केशवानंद भारती, मिनर्वा मिल्स, एस.आर. बोम्मई, विशाखा, एनजेएसी, 2G स्पेक्ट्रम इत्यादि) के माध्यम से यह स्पष्ट करने का प्रयास करता है कि न्यायिक सक्रियता किस हद तक शक्तियों के संतुलन को पुनर्संरचित करती है। लेख में लोकहित याचिकाओं की प्रवृत्ति, लंबित वादों, न्यायाधीश–जनसंख्या अनुपात आदि के प्रामाणिक आँकड़ों के आधार पर न्यायपालिका के बढ़ते बोझ और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के बीच तनाव को रेखांकित किया गया है। अंततः, यह निष्कर्ष निकाला गया है कि भारतीय संदर्भ में न्यायिक सक्रियता को न तो पूर्णतः ‘अतिअधिकार’ कहकर खारिज किया जा सकता है और न ही उसे निर्विवाद रूप से लोकतांत्रिक मुक्ति–उपकरण माना जा सकता है; बल्कि यह शक्तियों के पृथक्करण की गतिशील, राजनीतिक तौर पर विवादित किंतु अपरिहार्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
DOI: 10.33545/26646021.2025.v7.i1b.806Pages: 127-132 | Views: 79 | Downloads: 2Download Full Article: Click Here
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प्रियसी.
शक्तियों के पृथक्करण की अवधारणा पर न्यायिक सक्रियता का प्रभाव तथा एक राजनीतिक विश्लेषण. Int J Political Sci Governance 2025;7(1):127-132. DOI:
10.33545/26646021.2025.v7.i1b.806