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International Journal of Political Science and Governance
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P-ISSN: 2664-6021, E-ISSN: 2664-603X, Impact Factor: RJIF 5.32
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2024, Vol. 6, Issue 1, Part C

समाजवादी आंदोलन का प्रतिबिंब हैं अल्मोड़ा का कुली बेगार आंदोलन


Author(s): डाॅ. अर्चना लोहनी

Abstract: कुली बेगार प्रथा उत्तराखण्ड में कत्यूरी शासकों के समय से चली आ रही थी। इस प्रथा में गाॅव के लोग राजा व उसके दरबारियों के गाॅव में आने पर नि;शुल्क सेवा किया करते थे। यह प्रथा कत्यूरी शासकों से लेकर गोरखा वंश तक इसी प्रकार चलती रही किसी ने इसका खास विरोध नहीं किया। 1815 में कुमाऊॅ कमीश्नरी की स्थापना के बाद दूसरे कुमाऊॅ कमिश्नर विलियम टेªल ने इस प्रथा का अस्थाई हल निकालने के लिए सन् 1923 में खच्चर सेना की स्थापना की थीं।
1900 तक स्थानीय लोगों को ब्रिटिशर्स द्वारा चलाए जा रहे निर्माण कार्यो में अपने जरूरी कामों को छोड़कर जाना पड़ता था। इससे लोगों में ब्रिटिशर्स के प्रति भारी रोष था, इसके बावजूद भी वो बहुत अधिक विरोध नहीं पा रहे थें। 21 जुलाई 1903 में अल्मोड़ा के खत्याड़ी गाॅव में कुली बेगार प्रथा का प्रत्यक्ष रूप से विरोध किया गया। कुमाऊॅ कमिश्नरी के अन्तर्गत 1916 कुमाऊॅ परिषद का जन्म हुआ। 1920 में चैथे अधिवेशन में हरगोविन्द पंत जी की अध्यक्षता में ये प्रस्ताव लाया गया कि कुली बेगार प्रथा का अंत होना चाहिए।
14 फरवरी 1921 को बद्रीप्रसाद पाण्डे जी के नेतृत्व में 10 हजार लोगों ने कुली बेगार के रजिस्ट्ररों को फाड़ कर सरयू नदी बागेश्वर में बहा दिया। इसके बाद अनौपचारिक रूप से कुली बेगार प्रथा का अंत हुआ। गाॅधीजी द्वारा इसे रक्तहीन क्रान्ति का नाम दिया गया। इस आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण बद्रीदत्त पाण्डे को कुमाऊॅ केसरी की उपाधि दी गयी।


DOI: 10.33545/26646021.2024.v6.i1c.323

Pages: 195-196 | Views: 90 | Downloads: 3

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How to cite this article:
डाॅ. अर्चना लोहनी. समाजवादी आंदोलन का प्रतिबिंब हैं अल्मोड़ा का कुली बेगार आंदोलन. Int J Political Sci Governance 2024;6(1):195-196. DOI: 10.33545/26646021.2024.v6.i1c.323
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